चाक पर रखी मिट्टी की
होती हैं हसरतें हजार
कोई दिया बन के जुगनुओं सा
रातो में भटकना चाहता है
कोई दीप बन के जलना
चाहता है ख्वाबों में
मशाल बन कर हुजूर की कोई
दरबार में सजना चाहता है
दीपक बनाकर किस्मत की
कोई मंदिरों में जलना चाहता है
चराग बन के उम्मीदों का कोई
हवाओं से लड़ना चाहता है
कोई चुल्हा बनकर भूख की
आग बुझाना चाहता है
आफताब बनकर कोई
मेहराबों पर सजना चाहता है
बन के शमां बज़्म की कई तो
शाम रौशन करना चाहते हैं
तो कोई शमां कोठे पर
बुझ भी जाना चाहती है
बन के मिट्टी फिर से
नहीं चाक पर चढ़ना चाहती है
चाक पर तेरे घूम कर
सारी दुनियां देख ली
मंदिर-मस्जिद महफिल में
मिट्टी की कीमत जान ली
चाक पर चढ़ने के बाद
मिट्टी भी मां नहीं रही
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