शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

चाक

 

चाक पर रखी मिट्टी की

होती हैं हसरतें हजार

 

कोई दिया बन के जुगनुओं सा

रातो में भटकना चाहता है

 

कोई दीप बन के जलना

चाहता है ख्वाबों में

 

मशाल बन कर हुजूर की कोई

दरबार में सजना चाहता है

 

दीपक बनाकर किस्मत की

कोई मंदिरों में जलना चाहता है

 

चराग बन के उम्मीदों का कोई

हवाओं से लड़ना चाहता है

 

कोई चुल्हा बनकर भूख की

आग बुझाना चाहता है

 

आफताब बनकर कोई

मेहराबों पर सजना चाहता है

 

बन के शमां बज़्म की कई तो

शाम रौशन करना चाहते हैं

 

तो कोई शमां कोठे पर

बुझ भी जाना चाहती है

 

बन के मिट्टी फिर से

नहीं चाक पर चढ़ना चाहती है

 

चाक पर तेरे घूम कर

सारी दुनियां देख ली

 

मंदिर-मस्जिद महफिल में

मिट्टी की कीमत जान ली

 

चाक पर चढ़ने के बाद

मिट्टी भी मां नहीं रही

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मंजिल की प्यास

 

दो रोटी कमाने घर से निकला था मैं

पीछे पूरा जहां छोड़ कर गया

 

एक हसरत थी बनुं बड़ा आदमी

पूरी हसरत हुई तो बौना रह गया

 

हमसफर भी नहीं रहता उम्रभर साथ में

सफर के मकां भी क्रमशः छूटते चले गए

 

घर देता है उड़ने को नया आसमां

पंख अपने ठिकाने वह रखता नहीं

 

घर है मेरा आसमां से छोटा मगर

पूरे आसमां को है अंदर समेटे हुए

 

जो रोटी कमाने घर से निकला था मैं

मिली रोटी तो मंजिल की प्यास बढ़ गई

 

साजिश

  कोई दस्तक शोर

कदमों की आहट

मुझे यकीन है तुम यहीं हो

 

उडा़ रखी है मेरी नींदे जिसने

उसी पर एतबार भी है

सोएगा वो भी नहीं

बिना मुझे सुलाए  हुए

 

जाने कौन सा सुकून है सिराहने मां के

जब बैठता हूं तो बेचैनी भाग जाती है

 

नींद में भी डराने यदि जाए कोई

मां , बाबूजी को पहरे पर लगा देती है

 

नींद...बिस्तर...सपने सब डरते हैं मुझसे

मैं जागता हूं तो ये भाग जाते हैं

 

बड़ा नहीं हो पाया हूं अब भी आंचल से उसके

मैं रोता नहीं हूं फिर भी मां पुचकार देती है

 

एक जादू थी हवा में जो छू कर गुजर गई

जी उठे हैं रास्ते जो कल मुर्दा हुए थे

 

किस्से बढ़ा देते है थकान आंखों की

किताब खत्म हो तो किरदार को आराम मिले

 

बदलने लगा है मिजाज भी स्याही का

खामोश रहूं तो पसरने लगती है कगजों पर

और सूख जाती है तब जब लिखना चाहूं

 

यह साजिश नहीं अकेले स्याही की

कागज़ भी है इसमें सना हुआ

कौन सुनता है कलम की अकेले

 क्रमशः सभी हैं इसमे मिले हुए

मैं है

 मंजिल तुम्हें मुबारक...

जीना मुझे रास्तों ने सिखाया है

जो छूट गए सफर में फिर मिले नहीं कभी

मिले जो अजनबी, हमनवा हो गए है

 

दुनियां ने ठिकाने लगा दिया था

मेरा ठौर तो कायनात ने बदला है

तुमने तो दिल ही तोड़ा है था बस

टुकड़ों में धड़कना तो ठोकरों ने सिखाया है

 

तुम्हारी दुनियां से बेहतर है

नया ठिकाना मेरा

एक रौशनी है सुकून की

हवा है पानी है पहाड़ है

एक मकां है दिल का बड़ा सा

नहीं कुछ है तो बस मैं हैं

शुक्रवार, 14 मार्च 2025

शाम संग खेलूं होरी

यमुना के जल में
रंग नहीं डारो सखी...

डूबना नहीं है मुझे
रंगना है होरी सखी...

रंग, रंग डारो सखी
ऐसे नहीं टालो सखी।

रंग नहीं घोरना मुझे
रंग में है घुलना सखी !

तन से लिपटि मुझे
मन में है उतरना सखी !

घुल जाऊँ जब मैं
रंग में तेरे सखी !

उँडेल देना शाम के
सर पै मुझे सखी।

लट से लिपटि
चरणों में गिरू सखी।

अंग-अंग लग कर
शाम रंग होउ सखी...

यमुना के रंग में
रंग मत डालो सखी।

रविवार, 19 जनवरी 2025

आकाश कुम्भ


वो जानता है मुझको पर उसे मैं जानता नहीं हूं 

यही शिकायत जमाने को मुझसे हमेशा रही है 


जो करते हैं दावा जानने का सबकुछ

आईना भी उनको पहचानता नहीं है


आते हैं जाते हॅैं डूबते हैं साथ में

लेकिन कहानी सभी की अलग है


अज्ञानियों का अबूझ मेला है कुम्भ

यहां किसी को भी कोई जानता नहीं है


जिन्हें ढूंढने संगम में लगाते हो डुबकी

उन्हीं का तो कुम्भ लगा है आकाश में


वो मेरे हैं मैं उनका हूं 

ये भी तो हर कोई जानता नहीं हैं 




शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

दिल का मर्ज

नब्ज थाम कर दर्द की दवा लिख दी 

हाथ दिल पर रखता तो इलाज हो जाता


मेरा तबीब मेरा हिसाब कर देता है

नुस्खा नहीं बताता पर दिल की बात कह देता है


दिल का मर्ज दवा से दुरूस्त नहीं होता

संजीवनी  वो नज़रों से बयां कर देता है


हर मर्ज की अलग दवा देता है दवाखाना 

ये मयखाना है जो मर्ज में कोई फर्क नहीं करता 


उम्मीद...चाहत...भूख की जमींदारी है आदमी 

औकात सपनों की बंजर ज़मीन हो गई 


दावा...दुआ...टोना - टोटका आजमा लिया हूं सब

डायन नज़र तेरी, क्यों मुझेसे हटती नहीं है


क्यों हाल मेरा बार - बार पूछते हो तुम

क्या पता नहीं तुम्हें, मुझे हुआ क्या है



रविवार, 3 नवंबर 2024

डूबने दे

सतह पर सबकुछ

धुंधला है

तह पर पहले

उतरने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


आंखें मूंद कर

देखूं तुझको

वह अंतर्यात्रा करने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


थाह अथाह की लेने दे

राम प्यास को बुझने दे

बूंद-बूंद में राम बसे हैं

रगो में उसे उतरने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


राम रंग है

चढ़ा बदन पर

ह्रदय में उसे उतरने दे

रग में राम

बहते हैं कैसे

इसको जरा महसूसने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


डूब गया हूं आकंठ राम में

अब मुझको नहीं उबरना है

समझ गया हूं माया तेरी

डूबना ही जग में उबरना है

डूबते रहना है बस मुझको

तह तक नहीं पहुंचना है....

डूब रहा हूं प्रभू मैं तुझमे

मुझको बस

अब डूबने दे...



शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

मैं रेत हूं

घुल जाऊं तो कांच हूं

टकराऊं तो चट्टान

मैं रेत हूं 

रिसता हूं तो, समय बदल देता हूं


नहर, झील, सागर से भी

नहीं बुझती प्यास मेरी

नदी की कोख से 

निकल कर भी प्यासा हूं 

मैं रेत हूं

मैं सिर्फ अश्क पीता हूं


मुझमें तुम अपनी पहचान मत ढूंढ़ों

समय पर अपने पांवों के निशान मत ढूंढ़ो

बहुत दूर तक पांव भी चलते नहीं साथ में

तुम रेत पर अपने सफर का मकां मत ढूंढ़ों


रेत की आंखों में आज की चमक होती है

वो पीठ पर इतिहास का बोझ नहीं ढोते

आंधी, तुफान, बवंडर का डेरा है रेत में

मुट्ठी में रेत, इसीलिए कभी कैद नहीं होते






रविवार, 29 सितंबर 2024

पाक़ नज़र

 

अंधों के शहर में क़ातिल मुस्कान लिए फिरते हैं

आंखवालों के शहर को श्मसान बना रखा है


हर क़त्ल में खून के निशान नहीं होते

मुस्कुरा के मार देना भी गुनाह है


हिज़ाब कारगर सजा नहीं इस गुनाह की

पर्दे के पीछे भी हमने कई क़त्ल होते देखे हैं


अनगिनत गुनाह किए हैं इस हिज़ाब ने जनाब

देखते हैं मुस्कुराते हैं और पर्दा डाल देते हैं


इस मौत से बचने का एक ही इलाज है बस

बेहिज़ाब चेहरों पर नज़रे अपनी पाक रखिए



शनिवार, 21 सितंबर 2024

औकात चांद की

मां की हंसी पर सैंकड़ों चांद कुर्बान

तू पहला नहीं अपने पर इतराने वाला


मेरा सफर मेरे रास्तों से लंबा है

चांद कदमों में है...घर, मां से दूर


मैं खुद से अपनी बातें करता हूं

कोई दूसरा नहीं मुझे जानने वाला


ऐ चांद तुझे तेरी औकात बता देंगे 

धरती पे आ अपनी मां से मिला देंगे


चमकता बहुत है रात में तारों संग

जगो तो सूरज से सामना करा देंगे


कहानियां सब हैं झूठी तेरी

मिलो कभी तो आईना दिखा देंगे



रविवार, 15 सितंबर 2024

मधुबन में आओ

शांत चित्त से 

प्रिय तुम मेरे

मधुबन में आओ


हाथ थाम कर 

जमुना किनारे

अपनी धुन सुनाओ


तुम्हें निहारती 

रहूं मैं बैठी

ऐसी मुरली बजाओ


मुरली की धुन 

सुन सब भूलूं

मूंदू आंख, मिल जाउं


श्याम सुधा में 

भींगूं रस भर

पियूं घूंट तर जाउं




शनिवार, 7 सितंबर 2024

दिल करता है

सूरत अपनी देख कर, सो जाने को

दिल करता है

नफरत इतनी कि आईने को चूर कर देने को

दिल करता है


सपनों की तरह टूट कर बिखर जाने को 

दिल करता है

अकेलापन इतना कि खुद से भाग जाने को

दिल करता है


तारों की बारात को लुटा देने को 

दिल करता है

गहराई इतनी कि डूब जाने को

दिल करता है


शोर कर के बच्चों को जगा देने को

दिल करता है

खामोशी ऐसी कि किस्मत पे रोने को 

दिल करता है


आंसूओं की बारिश से ज्वालामुखी बुझाने को 

दिल करता है

दहक इतनी की सब राख कर देने को

दिल करता है


शनिवार, 17 अगस्त 2024

चौखट

रोकता हूं बहुत खुद को

फिर भी खिंचा आता हूं

मंजिल तक आकर फिसल जाता हूं

मुंहाने पर गली के तेरी ठिठक जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं


लिखता हूं मिटाता हूं

स्याही में घुला, तेरा नाम 

सबसे छिपाता हूं

खत लिखने से पहले ही फाड़ देता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं


बंद हैं दरवाजे सारे

बंद हैं खिड़कियां

खुले रोशनदान की कुंडी

खटखटाने से डर जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

भीड़ है चारों तरफ

और सामने हो तुम 

बातें हैं बहुत सारी

कहने से रह जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

चेहरे पर हंसी चस्पा करूं कैसे 

आंसूओं की बाढ़ को बांधूं मैं कैसे 

रंग है जो रक्त का उसे बदलूं मैं कैसे 

सोच कर बेबसी यह सहम जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

जीतूं मैं किससे

किस को परास्त कर दूं

द्वंद है दसों दिशाओं में स्थिर मैं रहूं कैसे

रिश्तों के इस मकड़जाल में उलझ जाता हूं 

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं


शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

लापता लेडीज : पता पूरा...संदेश अधूरा

स्त्री विमर्श को केंद्र में रख कर बनी इस फिल्म में कहानी जिस तरह से शुरू होती है उससे कहानी का अंदाजा तो आप लगा लेंगे लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी आपका अंदाजा गलत साबित होता चला जाएगा। कहानी में कोई बॉलीवुड मसाला नहीं है लेकिन स्वाद चोखा है । फिल्म का संदेश स्त्री को आत्मनिर्भर बनाने को लेकर है। लेकिन इस मूल संदेश को स्थापित करने के क्रम में फिल्म में स्त्री के संघर्ष के जिन आयामों को दिखाया गया है वह पुरूष प्रधान समाज के विद्रूप चेहरे को भी बेपर्दा करता है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर चाय की दुकान चलाने वाली दादी मां का संधर्षशील आत्मनिर्भर चरित्र, स्त्री के फाइनेंसिएल इंडीपेंडेंस के महत्व को बताता है। फिल्म के नायक स्त्रियों के जरिए स्त्रियों को अपना आसमान चुनने और अपने लिए जीने के अधिकार के संदेश को बखूबी प्रेषित किया गया है। फिल्म का अंत 70 के दशक में बनने वाली सुखांत फिल्मों के जैसी है लेकिन इसका संदेश आने वाले सौ वर्षो तक समाज को मिलता रहेगा। क्रिटिक की दृष्टि से यदि आप देखें तो फिल्म में आपको कुछ कमियां भी नजर आएंगी जो स्क्रिप्ट के कसाव और निर्देशन की खूबीयों में छुप सी गई है। मसलन फिल्म की शुरूआत जिस घुंघट की समस्या के कारण हुई है फिल्म के अंत तक उसका कोई समाधान या निदान नहीं दिखाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो घुंघट स्त्री की किस्मत है जिससे उसका छुटकारा संभव नहीं चाहे  वह कितनी भी सशक्त हो जाए समाज और परिवार का घुंघट चेहरे पर टिकाए रखना उसी की जिम्मेदारी है। एक और कमी जो इस फिल्म में मुझे दिखी वह है बाल विवाह को स्वीकार करने की। फिल्म में बाल विवाह को यदि प्रमोट नहीं किया गया है तो उसे अस्वीकार भी नहीं किया गया है जो कि किया जाना चाहिए था। 12वीं पास जया की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ होना फिल्म में दिखाया गया है। फूल की उम्र का स्पष्ट जिक्र तो नहीं है लेकिन जिस तरह एक सीन में फूल को जया के पैर छूते दिखाया गया है उससे लगता है कि निर्देशक कहानी में उसे जया से छोटी दिखाना चाहती है। मतलब ये कि नबालिग की शादी को फिल्म में स्वीकार कर लिया गया है। स्त्री विमर्श पर बनी इस फिल्म में यदि इन दोनों विषयों को भी एड्रेस किया जाता तो फिल्म और भी मजबूत दिख सकती।                                                                                           AI के जमाने में साइबर कैफे युग की पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाने के लिए सोचना तभी संभव हो सकता है जब आपके पास विप्पलव गोस्वामी की एक मजबूत स्क्रिप्ट, विषय की गहरी समझ रखने वाले स्क्रीन प्ले और डायलॉग राइटर स्नेहा देसाइ और कहानी को जीने का जनून रखने वाले प्रोड्यूसर  आमिर खान और डायरेक्टर किरण राव हो । किरण राव जो प्रोड्यूसर के साथ-साथ फिल्म की डायरेक्टर भी हैं इस मामले में लकी रहीं कि उन्हें अपनी फिल्म लापता लेडीज को बनाने के लिए वो टीम देर से ही सही लेकिन मिल गई। और लापता लेडीज को सफलता का पता मिल गया। लेकिन मेरी तरफ से फिल्म को 10 में से 6 नंबर ही मिलेंगे।