शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

चाक

 

चाक पर रखी मिट्टी की

होती हैं हसरतें हजार

 

कोई दिया बन के जुगनुओं सा

रातो में भटकना चाहता है

 

कोई दीप बन के जलना

चाहता है ख्वाबों में

 

मशाल बन कर हुजूर की कोई

दरबार में सजना चाहता है

 

दीपक बनाकर किस्मत की

कोई मंदिरों में जलना चाहता है

 

चराग बन के उम्मीदों का कोई

हवाओं से लड़ना चाहता है

 

कोई चुल्हा बनकर भूख की

आग बुझाना चाहता है

 

आफताब बनकर कोई

मेहराबों पर सजना चाहता है

 

बन के शमां बज़्म की कई तो

शाम रौशन करना चाहते हैं

 

तो कोई शमां कोठे पर

बुझ भी जाना चाहती है

 

बन के मिट्टी फिर से

नहीं चाक पर चढ़ना चाहती है

 

चाक पर तेरे घूम कर

सारी दुनियां देख ली

 

मंदिर-मस्जिद महफिल में

मिट्टी की कीमत जान ली

 

चाक पर चढ़ने के बाद

मिट्टी भी मां नहीं रही

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