न कोई दस्तक न शोर
न कदमों की आहट
मुझे यकीन है तुम यहीं हो
उडा़ रखी है मेरी नींदे जिसने
उसी पर एतबार भी है
सोएगा वो भी नहीं
बिना मुझे सुलाए
हुए
न जाने कौन सा सुकून है सिराहने मां के
जब बैठता हूं तो बेचैनी भाग जाती है
नींद में भी डराने यदि आ जाए कोई
मां , बाबूजी को पहरे पर लगा देती है
नींद...बिस्तर...सपने सब डरते हैं मुझसे
मैं जागता हूं तो ये भाग जाते हैं
बड़ा नहीं हो पाया हूं अब भी आंचल से उसके
मैं रोता नहीं हूं फिर भी मां पुचकार देती है
एक जादू थी हवा में जो छू कर गुजर गई
जी उठे हैं रास्ते जो कल मुर्दा हुए थे
किस्से बढ़ा देते है थकान आंखों की
किताब खत्म हो तो किरदार को आराम मिले
बदलने लगा है मिजाज भी स्याही का
खामोश रहूं तो पसरने लगती है कगजों पर
और सूख जाती है तब जब लिखना चाहूं
यह साजिश नहीं अकेले स्याही की
कागज़ भी है इसमें सना हुआ
कौन सुनता है कलम की अकेले
क्रमशः सभी हैं इसमे मिले हुए
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