शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

साजिश

  कोई दस्तक शोर

कदमों की आहट

मुझे यकीन है तुम यहीं हो

 

उडा़ रखी है मेरी नींदे जिसने

उसी पर एतबार भी है

सोएगा वो भी नहीं

बिना मुझे सुलाए  हुए

 

जाने कौन सा सुकून है सिराहने मां के

जब बैठता हूं तो बेचैनी भाग जाती है

 

नींद में भी डराने यदि जाए कोई

मां , बाबूजी को पहरे पर लगा देती है

 

नींद...बिस्तर...सपने सब डरते हैं मुझसे

मैं जागता हूं तो ये भाग जाते हैं

 

बड़ा नहीं हो पाया हूं अब भी आंचल से उसके

मैं रोता नहीं हूं फिर भी मां पुचकार देती है

 

एक जादू थी हवा में जो छू कर गुजर गई

जी उठे हैं रास्ते जो कल मुर्दा हुए थे

 

किस्से बढ़ा देते है थकान आंखों की

किताब खत्म हो तो किरदार को आराम मिले

 

बदलने लगा है मिजाज भी स्याही का

खामोश रहूं तो पसरने लगती है कगजों पर

और सूख जाती है तब जब लिखना चाहूं

 

यह साजिश नहीं अकेले स्याही की

कागज़ भी है इसमें सना हुआ

कौन सुनता है कलम की अकेले

 क्रमशः सभी हैं इसमे मिले हुए

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