रविवार, 3 नवंबर 2024

डूबने दे

सतह पर सबकुछ

धुंधला है

तह पर पहले

उतरने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


आंखें मूंद कर

देखूं तुझको

वह अंतर्यात्रा करने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


थाह अथाह की लेने दे

राम प्यास को बुझने दे

बूंद-बूंद में राम बसे हैं

रगो में उसे उतरने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


राम रंग है

चढ़ा बदन पर

ह्रदय में उसे उतरने दे

रग में राम

बहते हैं कैसे

इसको जरा महसूसने दे

अभी डूब रहा हूं

डूबने दे


डूब गया हूं आकंठ राम में

अब मुझको नहीं उबरना है

समझ गया हूं माया तेरी

डूबना ही जग में उबरना है

डूबते रहना है बस मुझको

तह तक नहीं पहुंचना है....

डूब रहा हूं प्रभू मैं तुझमे

मुझको बस

अब डूबने दे...



शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

मैं रेत हूं

घुल जाऊं तो कांच हूं

टकराऊं तो चट्टान

मैं रेत हूं 

रिसता हूं तो, समय बदल देता हूं


नहर, झील, सागर से भी

नहीं बुझती प्यास मेरी

नदी की कोख से 

निकल कर भी प्यासा हूं 

मैं रेत हूं

मैं सिर्फ अश्क पीता हूं


मुझमें तुम अपनी पहचान मत ढूंढ़ों

समय पर अपने पांवों के निशान मत ढूंढ़ो

बहुत दूर तक पांव भी चलते नहीं साथ में

तुम रेत पर अपने सफर का मकां मत ढूंढ़ों


रेत की आंखों में आज की चमक होती है

वो पीठ पर इतिहास का बोझ नहीं ढोते

आंधी, तुफान, बवंडर का डेरा है रेत में

मुट्ठी में रेत, इसीलिए कभी कैद नहीं होते






रविवार, 29 सितंबर 2024

पाक़ नज़र

 

अंधों के शहर में क़ातिल मुस्कान लिए फिरते हैं

आंखवालों के शहर को श्मसान बना रखा है


हर क़त्ल में खून के निशान नहीं होते

मुस्कुरा के मार देना भी गुनाह है


हिज़ाब कारगर सजा नहीं इस गुनाह की

पर्दे के पीछे भी हमने कई क़त्ल होते देखे हैं


अनगिनत गुनाह किए हैं इस हिज़ाब ने जनाब

देखते हैं मुस्कुराते हैं और पर्दा डाल देते हैं


इस मौत से बचने का एक ही इलाज है बस

बेहिज़ाब चेहरों पर नज़रे अपनी पाक रखिए



शनिवार, 21 सितंबर 2024

औकात चांद की

मां की हंसी पर सैंकड़ों चांद कुर्बान

तू पहला नहीं अपने पर इतराने वाला


मेरा सफर मेरे रास्तों से लंबा है

चांद कदमों में है...घर, मां से दूर


मैं खुद से अपनी बातें करता हूं

कोई दूसरा नहीं मुझे जानने वाला


ऐ चांद तुझे तेरी औकात बता देंगे 

धरती पे आ अपनी मां से मिला देंगे


चमकता बहुत है रात में तारों संग

जगो तो सूरज से सामना करा देंगे


कहानियां सब हैं झूठी तेरी

मिलो कभी तो आईना दिखा देंगे



रविवार, 15 सितंबर 2024

मधुबन में आओ

शांत चित्त से 

प्रिय तुम मेरे

मधुबन में आओ


हाथ थाम कर 

जमुना किनारे

अपनी धुन सुनाओ


तुम्हें निहारती 

रहूं मैं बैठी

ऐसी मुरली बजाओ


मुरली की धुन 

सुन सब भूलूं

मूंदू आंख, मिल जाउं


श्याम सुधा में 

भींगूं रस भर

पियूं घूंट तर जाउं




शनिवार, 7 सितंबर 2024

दिल करता है

सूरत अपनी देख कर, सो जाने को

दिल करता है

नफरत इतनी कि आईने को चूर कर देने को

दिल करता है


सपनों की तरह टूट कर बिखर जाने को 

दिल करता है

अकेलापन इतना कि खुद से भाग जाने को

दिल करता है


तारों की बारात को लुटा देने को 

दिल करता है

गहराई इतनी कि डूब जाने को

दिल करता है


शोर कर के बच्चों को जगा देने को

दिल करता है

खामोशी ऐसी कि किस्मत पे रोने को 

दिल करता है


आंसूओं की बारिश से ज्वालामुखी बुझाने को 

दिल करता है

दहक इतनी की सब राख कर देने को

दिल करता है


शनिवार, 17 अगस्त 2024

चौखट

रोकता हूं बहुत खुद को

फिर भी खिंचा आता हूं

मंजिल तक आकर फिसल जाता हूं

मुंहाने पर गली के तेरी ठिठक जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं


लिखता हूं मिटाता हूं

स्याही में घुला, तेरा नाम 

सबसे छिपाता हूं

खत लिखने से पहले ही फाड़ देता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं


बंद हैं दरवाजे सारे

बंद हैं खिड़कियां

खुले रोशनदान की कुंडी

खटखटाने से डर जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

भीड़ है चारों तरफ

और सामने हो तुम 

बातें हैं बहुत सारी

कहने से रह जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

चेहरे पर हंसी चस्पा करूं कैसे 

आंसूओं की बाढ़ को बांधूं मैं कैसे 

रंग है जो रक्त का उसे बदलूं मैं कैसे 

सोच कर बेबसी यह सहम जाता हूं

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं

 

जीतूं मैं किससे

किस को परास्त कर दूं

द्वंद है दसों दिशाओं में स्थिर मैं रहूं कैसे

रिश्तों के इस मकड़जाल में उलझ जाता हूं 

मैं रोज तेरी चौखट से लौट आता हूं